तुलसी में हज़ार गुण होते हैं। इसीलिए इसे धार्मिक मान्‍यताओं से जोड़ दिया गया, ताकि सभी के घर में एक तुलसी का पौधा ज़रूर रहे। तुलसी के रग-रग में औषधि समाई हुई है, उसके पत्ते हों, बीज हों या जड़। सभी की मानव जीवन के स्‍वास्‍थ्‍य में महत्‍वपूर्ण भूमिका है। ख़ासकर सर्दी-जुकाम में तो इसका प्रयोग रामबाण है। निरोग रहने के लिए तुलसी की चटनी दही के साथ भी खायी जाती है।

इसके पौधे अपने आसपास कीटाणुओं को पनपने नहीं देते। इससे होकर गुज़रने वाली हवा रोग मुक्‍त होती है। इसीलिए इसे घर के बाहर दरवाज़े पर लगाया जाता है ताकि हवा उसे छूकर घर में जाए और कीटाणुओं का नाश करे। इसका महत्‍व इसी से पता चलता है कि पहले जब हमारे घरों में चौका व्‍यवस्‍था थी। खाना बनने के बाद जब ठाकुर जी को भोग लगाया जाता था, उसके बाद ही भोजन किसी को परोसा जाता था।

तुलसी की पत्तियाँ
Tulsi Leaves Medicinal Benefits

ठाकुर जी के भोग में तुलसी का पत्‍ता महत्‍वपूर्ण होता था, भोग लगने के बाद तुलसी के पत्ते को प्रसाद स्‍वरूप सभी भोजन सामग्रियों में डाला जाता था। इसके पीछे यही उद्देश्‍य था कि भोजन में जो थोड़े-बहुत विकार हों, वे नष्‍ट हो जाएं। जबसे किचेन का चलन हुआ, चौका व्‍यवस्‍था समाप्‍त हो गई, अभी गांवों में कुछ घरों में ठाकुर जी को भोग लगाने के बाद ही भोजन परोसा जाता है। इस तरह हमारी संस्‍कृति ने तुलसी को मनुष्‍य जीवन में शामिल कर लिया था। तुलसी के सभी लाभ जानिए

तुलसी की चटनी व दही

तुलसी की चटनी और दही एक साथ खाने से अनेक प्रकार के रोगों में लाभ मिलता है। खांसी, सर्दी, जुकाम, जन्मजात जुकाम, सांस के रोग, दमा, भूल जाने की समस्‍या, सिर दर्द, पुराना से पुराना सिर दर्द, नेत्र-पीड़ा, हाई ब्‍लडप्रेशर, लो ब्‍लडप्रेशर, हृदय रोग, मोटापा, मंदाग्नि, अम्लता, आंव, कब्ज़, गैस, किडनी ठीक से काम न कर रही हो, किडनी की पथरी, गठिया, बुढ़ापे की कमजोरी, विटामिन ए व सी की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग, सफेद दाग, कुष्ठ रोग,चर्म रोग, शरीर की झुर्रियां, पुरानी बिवाइयां, महिलाओं की बहुत सी बीमारियां, बुखार, खसरा व कैंसर आदि रोगों में तुलसी की चटनी व ताज़ा दही कारगर इलाज है, लेकिन दिन में एक बार इसका सेवन नियमित रूप से कम से कम तीन माह करना आवश्‍यक है।

प्रयोग विधि

तुलसी की 21 से 35 ताजी पत्तियां तोड़ लें। उन्‍हें धोकर साफ़ सिल-बट्टे पर चटनी की तरह पीस लें। इस चटनी में 10 से 30 ग्राम ताज़ा दही मिलाकर खाली पेट तीन महीने तक नियमित सेवन करें। इसका प्रयोग दिन में एक बार ही सुबह करना चाहिए। यह ध्‍यान रखना ज़रूरी है कि दही खट्टा न हो। दही ताज़ा होना चाहिए, यदि खाने में अच्‍छा न लग रहा हो तो थोड़ा मधु मिला सकते हैं। छोटे बच्चों को मधु में आधा ग्राम यह औषधि मिलाकर देना चाहिए। इसके साथ दूध भूलकर भी न दें। इस औषधि के सेवन के आधा घंटे बाद ही कुछ खाएं। कैंसर आदि कष्‍टप्रद रोगों व असह्य दर्द में इसका सेवन दिन में दो-तीन बार भी कर सकते हैं।