त्राटक योग महर्षि पतंजलि द्वारा दी गई एक अति प्राचीन ध्‍यान प्रक्रिया है। इस विधि के प्रयोग से एकाग्रता बढ़ती है और बहुत सारे शरीर के विकार समाप्‍त हो जाते है। लेकिन इस विधि का प्रयोग योग्‍य प्रशिक्षक के साथ ही करना चाहिए, वरना आँख ख़राब होने का ख़तरा रहता है।

ध्‍यान विधि कोई भी हो, वह तनाव को ही समाप्‍त करती है। मन को शांत व शून्‍य करती है। इसलिए तनाव दूर हो जाता है। हालांकि ध्‍यान व एकाग्रता में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। ध्‍यान को अंग्रेजी में मेडिटेशन कहते हैं और एकाग्रता को कंस्‍टंट्रेशन कहते हैं। ध्‍यान में कुछ भी करना नहीं होता बल्कि केवल देखना होता है, लेकिन इस स्थिति को उपलब्‍ध होने के लिए ध्‍यान विधियों का प्रयोग किया जाता है। ऐसी ही एक ध्‍यान विधि त्राटक योग है जिसके प्रयोग से ध्‍यान को उपलब्‍ध हुआ जा सकता है।

त्राटक योग साधना

त्राटक योग साधना क्या है?

त्राटक योग में एक निश्चित बिंदु पर एकटक देखने का अभ्‍यास किया जाता है। अपनी सारी ऊर्जा चारों तरफ़ से समेट कर उस बिंदु पर फ़ोकस करना होता है। वह बिंदु कुछ भी हो सकता है। एक काग़ज़ का टुकड़ा लें और पूरा काले रंग से रंग दें। उसके बीच में लाल, पीला किसी भी रंग का एक बिंदु बना दें और काग़ज़ को दीवार पर चिपका दें। थोड़ी दूर पर किसी चीज़ का आसन बिछाकर उस पर बैठकर काग़ज़ पर बने लाल या पीले बिंदु को एकचित्त होकर देखना होता है।आसन पर बैठना ज़रूरी इसलिए है कि प्रयोग के दौरान पैदा होने ऊर्जा ज़मीन न चली जाए।

मोमबत्‍ती की लौ पर भी यह प्रयोग कर सकते हैं। प्रयोग करते समय यह ज़रूर ध्‍यान रखना चाहिए कि बिंदु को सिर्फ़ आँखों से न देखें बल्कि आँखें देखने का माध्‍यम भर हों, उसे मन देखें। पूरे मन को वहीं लगाना होता है। यदि केवल आँखें उसे देख रही हैं और मन विचारों में खोया है तो इससे कोई फ़ायदा नहीं होगा और आँखों को नुकसान हो सकता है। यदि इसका अभ्‍यास ठीक ढंग से कुशल प्रशिक्षक की देखरेख में किया गया तो त्राटक एक चमत्‍कारिक परिणाम देता है।

यह स्‍मरण शक्ति व आत्‍म शक्ति बढ़ाने के साथ ही मन व आत्‍मा तथा शरीर व आत्‍मा के भेद को उपस्थित कर देता है और जीवन का बोध होना शुरू हो जाता है। इसका सघन प्रयोग करने के बाद पता चल जाता है कि मैं शरीर नहीं हूँ।

त्राटक योग करने का सही समय

इसका प्रयोग संधि बेला में ज़्यादा लाभकारी होता है। सूर्योदय या सूर्यास्‍त के समय इसका प्रयोग करना चाहिए। इस बात का ध्‍यान रखना चाहिए कि जहाँ आप यह प्रयोग कर रहे हैं वहाँ किसी तरह का अवरोध उत्‍पन्‍न न हो, उस कमरे में प्रयोग के दौरान कोई न आए या आपकी साँकल कोई न खटखटाए, इससे आपका ध्‍यान भंग हो सकता है, थोड़ा सा भी ध्‍यान भटका तो प्रयोग के दौरान पैदा हुई सारी ऊर्जा बिखर जाती है और पुन: प्रयोग के लिए फिर से नए सिरे से ऊर्जा संग्रहित करनी होती है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो आपकी पूरी मेहनत बेकार चली जाती है। इसलिए इसके प्रयोग के लिए एकांत व शांत स्‍थान का होना ज़रूरी है। बहुत से लोग इसका प्रयोग रात को करते हैं।

सावधनियाँ और अन्य विकल्प

यदि आपकी आँखें ख़राब हों तो इसके प्रयोग से बचना चाहिए। अन्‍य ध्‍यान विधियों ख़ासकर भगवान बुद्ध द्वारा दी गई विपश्‍यना या अनापानसती योग का प्रयोग करना चाहिए।

विपश्‍यना योग में हम आसन पर चुपचाप बैठ जाते हैं और पूरे शरीर व मन की हलचल को देखते रहते हैं, यहाँ तक कि देखने वाले को भी देखते हैं। शुद्ध रूप से हम द्रष्‍टा होते हैं। हम कुछ कर नहीं रहे होते हैं, सिर्फ़ देख रहे होते हैं, विचार आ रहे हैं, उन्‍हें रोकने की कोशिश नहीं करते हैं बल्कि उन्‍हें आते-जाते देखते रहते हैं। पूरा ध्‍यान साँसों पर रहता है। साँसें आ रही हैं, जा रही हैं, हम केवल उन्‍हें देख रहे हैं। जादू यह है कि जब हम साँसों को देखते हैं तो केवल साँसों की गति ही पता नहीं चलती बल्कि शरीर व मन में होने वाली हर हलचल हमें पता चलती है।

दूसरी विधि अनापानसती योग में हम द्रष्‍टा नहीं कर्ता होते हैं। इसमें हम गहरी साँसें लेते हैं और छोड़ते हैं। कोई भी ध्‍यान प्रयोग कम से 45 मिनट करना चाहिए। शुरू में यदि इतना संभव नहीं है तो कम समय तक करें और धीरे-धीरे इसका समय बढ़ाते जाएं। इसके अलावा कोई भी ध्‍यान विधि तनाव को दूर कर सकती है जो भी सुविधाजनक है और जिसके प्रशिक्षक आपको आसानी से उपलब्‍ध हैं, वही प्रयोग करना चाहिए।

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