संतान प्राप्ति हर दंपती की अभिलाषा होती है। हर लड़की मातृत्‍व सुख चाहती है। अपनी संतान को जन्‍म देकर उसके साथ खेलना चाहती है। घर में एक बच्‍चा हो तो तमाम तरह के तनाव स्‍वत: विदा हो जाते हैं। शादी के बाद बहुत दिनों तक बच्‍चा पैदा न हो तो ढेर सारे तनाव घेर लेते हैं। संतान न होने से अनेक प्रकार के ताने व यातनाएं भी झेलनी पड़ती हैं। इसलिए हम आपको संतान प्राप्ति के लिए आदिवासियों द्वारा प्रयोग में लाए जाने नुस्‍खों के बारे में बताने जा रहे हैं।

शिवलिंगी से संतान प्राप्ति

 

शिवलिंगी

शिवलिंगी एक पौधा है। इसका वानस्‍पतिक नाम ब्रयोनोप्सिस लेसिनियोसा (Bryonopsyis laciniosa) है। शिवलिंगी के बीजों का आकार शिवलिंग की भांति होता है। इसीलिए इसे शिविलंगी कहते हैं। यह हमारे आसपास प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके बीज बाज़ार में भी मिलते हैं। इसका उपयोग अनेक प्रकार की बीमारियों में औषधि के रूप में किया जाता है लेकिन विशेष रूप से इसका उपयोग संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है।

आदिवासी समाज इस पौधे की पूजा करता है।

संतान प्राप्ति के लिए प्रयोग

– आदिवासी महिलाएं शिवलिंगी की चटनी का टॉनिक के रूप में इस्‍तेमाल करती हैं। उनके अनुसार मासिक धर्म समाप्त होने के 4 दिन बाद से सात दिन तक लगातार शिवलिंगी के 5 बीज खिलाए जाएं तो महिला के गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है। शिवलिंगी के बीजों को तुलसी व गुड़ के साथ पीसकर नि:संतान महिला को सेवन कराया जाता है। आदिवासी महिलाओं के अनुसार इससे जल्‍दी ही गर्भधारण हो जाता है।

शिवलिंगी के बीज

– नि:संतान महिलाओं को शिवलिंगी क बीजों व चटनी दोनों का सेवन कराने से विशेष लाभ होता है।

– शिवलिंगी की पत्तियों को बेसन के साथ मिलाकर सब्ज़ी भी बनाई जाती है। इस सब्‍ज़ी का सेवन करने से स्‍वस्‍थ संतान पैदा होती है।

– आदिवासियों के अनुसार शिवलिंगी के बीजों, चटनी व सब्‍ज़ी खाने से पुत्र संतान की संभावना ज़्यादा रहती है। आदिवासी इलाकों में इसका बहुतायत प्रयोग किया जाता है। जिन्‍हें किसी तरह आकांक्षा नहीं है, वे लोग भी इसकी सब्‍ज़ी व चटनी का सेवन करते हैं।

-चुस्‍त-दुरुस्‍त, स्‍वस्‍थ व तेजवान बच्‍चा पैदा करने के लिए गुजरात के डांग क्षेत्र के आदिवासी शिवलिंगी के बीजों, पुत्रंजीवा, नागकेशर व पारस पीपल के बीजों की समान मात्रा लेकर चूर्ण बनाते हैं। गाय के दूध के साथ आधा चम्‍मच यह चूर्ण गर्भवती महिला को सात दिन तक खिलाया जाता है। इस चूर्ण का सेवन आम आदिवासी भी सेहत के लिए करते हैं, इससे बुखार भी नियंत्रित होता है। त्‍वचा रोगों की निजात के लिए भी इस चूर्ण का सेवन किया जाता है।

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