रक्त संचार ‌_ Blood Circulation में जब बाधा पहुंचती है तो शिराओं में रक्‍त सुगमता से प्रवाहित नहीं हो पाता। साथ ही रक्त को वापस हृदय तक ले जाने वाली शिराओं में सूजन आ जाता है और वे मोटी होकर त्‍वचा के सतह पर नीले रंग की दिखाई देने लगती हैं। इसकी वजह से पैरों में अधिक थकान व दर्द शुरू हो जाता है। चूंकि हृदय की रक्‍त ले जाने वाली शिराओं में वाल्‍व लगे होते हैं जो रक्‍त की एक दिशा निर्धारित करते हैं। जब शिराओं के रक्त संचार में बाधा उत्‍पन्‍न होती है तो शिराएं फैल जाती हैं और रक्‍त उसमें जमा होने लगता है। इस वजह से सूजन आ जाता है और शिराएं मोटी होकर त्‍वचा के सतह पर दिखने लगती हैं।

रक्त संचार की प्रक्रिया

रक्त में मौजूद हिमोग्लोबिन शरीर के ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण कर शिराओं से होकर फेफड़ों में जाता है और वहाँ श्वास लेने की प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़कर शुद्ध ऑक्सीजन ग्रहण करता है। जब यह कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करता है तो रक्‍त अशुद्ध हो जाता है, इसे कार्बोक्सी हिमोग्लोबिन कहते हैं, जब फेफड़ों में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़कर ऑक्सीजन ग्रहण करता है तो रक्‍त शुद्ध होता है। इस शुद्ध रक्‍त को धमिनयाँ कोशिकाओं तक पहुंचाती हैं। अशुद्ध रक्त का रंग लालिमा लिए हुए नीला या बैंगनी होता है। शिराएं त्‍वचा के ठीक नीचे होती हैं तथा इनकी भित्ति पतली होने से त्‍वचा के ऊपर से इन्‍हें देखा जा सकता है। अशुद्ध रक्‍त के कारण ये शिराएं हमें नीले रंग में दिखाई पड़ती हैं। धमनियों में लाल रक्‍त प्रवाहित होता है और इनकी भित्ति शिराओं की अपेक्षा थोड़ी मोटी होती है और ये गहराई में स्थित होती हैं, इसलिए धमनियाँ दिखाई नहीं पड़तीं।

रक्त संचार

रक्त संचार में बाधा के कारण

रक्‍त शिराओं में बाधा उत्‍पन्‍न करने के मुख्‍य कारण कब्ज़, खान-पान व गर्भावस्‍था से संबंधित रोग आदि हैं। इसके अलावा आलस्‍य, व्यायाम की कमी, बहुत समय तक खड़े रहने, अधिक तंग वस्त्र पहनने व मोटापा की वजह से भी यह रोग उत्‍पन्‍न हो सकता है। चूंकि किचन में खड़ा होकर खाना बनाने के चलते महिलाओं में यह रोग ज़्यादा दिखता है।

रक्त संचार में बाधा के लक्षण

टांगों में दर्द, थकान, भारीपन, रात को सोते समय टांगों में ऐंठन, टखनों में सूजन, त्‍वचा के रंग में परिवर्तन व त्‍वचा रोग आदि इसके मुख्‍य लक्षण हैं।

घरेलू उपाय

– पीड़ित को कुछ दिनों तक भोजन नहीं लेना चाहिए, उसे केवल नारियल का पानी, जौ का पानी, हरी धनिया का पानी, खीरा का पानी, गाजर का रस, पत्तागोभी, पालक आदि का रस ही पीना चाहिए। इसके साथ हरी सब्ज़ियों का सूप पिया जा सकता है। इसके बाद कुछ दिन तक भोजन के रूप फल, सलाद व अंकुरित दालों का सेवन करना चाहिए। उन चीजों का सेवन ज़्यादा करना चाहिए जिसमें विटामिन सी तथा ई भरपूर मात्रा में हों।

– रक्त संचार की बाधा से उत्‍पन्‍न होने वाले रोगों में गरम पानी व एनिमा लेना चाहिए। कटिस्‍नान करना चाहिए और पैरों में मिट्टी का लेप लगाना चाहिए। यदि रोगी का वज़न कम हो तो मिट्टी का लेप कम करना चाहिए।

– जब शरीर या पैर में ऐंठन व दर्द अधिक हो तो उसे पहले गर्म पानी से स्‍नान कराकर पुन: ठंडे पानी से स्‍नान कराना चाहिए।

– पीड़ित को गहरे पानी में खड़ा करने से भी लाभ मिलता है।

– पैरों को ऊपर उठाकर सोने से भी आराम मिलता है।

योगासन

सूर्यनमस्कार, शीर्षासन, सर्वांगासन, विपरीतकरणी, पवनमुक्तासन, उत्तानपादासन, योगमुद्रासन आदि के प्रयोग से भी अभूतपूर्व लाभ होता है लेकिन इन आसनों को किसी योग्‍य योगाचार्य की देखरेख में ही करना श्रेयष्‍कर है।

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