सामाजिक भाव भूमि पर भावनात्मक संबंधों के चलते मनुष्य में प्रेम का विकास होता है। इसमें संबंधों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार शरीर में कुछ ऐसे हार्मोंस व रसायन होते हैं जिनका सम्मिश्रण व्यक्ति को पे्रम की दहलीज़ पर ले जाता है। प्यार के कई चरण हैं और हर चरण के लिए अलग-अलग हार्मोंस व रसायन ज़िम्मेदार होते हैं। कुछ लोग प्रेम को रोग की संज्ञा दे देते हैं, जबकि यह सिर्फ़ हार्मोनल बदलाव है। प्रेम एक सकारात्मक भावना है जिससे हम सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज़ हो जाते हैं, जबकि रोग नकारात्मक शब्द है, इसे प्रेम से जोड़कर उसकी पवित्रता को नष्ट नहीं करना चाहिए। आइए प्यार के रसायन शास्त्र को चिकित्सा विज्ञान की भाषा में समझने की कोशिश करते हैं।

चिकित्सा विज्ञान और प्रेम सम्बंध

चिकित्सा विज्ञान और मोह

मोह प्यार की दुनिया में प्रवेश के पूर्व का पहला पड़ाव है। मनुष्य में इसकी उत्पत्ति का मूल कारण सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन है।

एक-दूसरे के प्रति आकर्षण

दूसरे पड़ाव पर स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। यह स्थिति दोनों को भावनाओं से भर देती है और व्यक्ति मोह से थोड़ा ऊपर उठकर सोचने लगता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस स्थिति के लिए मुख्य रूप से तीन न्यूरोट्रांसमीटर्स -एड्रेनेलिन, डोपमाइन और सेरोटोनिन ज़िम्मेदार होते हैं।

एड्रेनेलिन

जब स्त्री-पुरुष आकर्षण से आगे बढ़ते हैं तो प्रेम के साथ-साथ तनाव में भी भारी इज़ाफ़ा होता है। इसकी वजह से रक्त में एड्रेनेलिन और कोर्टीसोल हार्मोन के स्तर में वृद्धि हो जाती है जो बेचैनी को जन्म देती है। स्त्री-पुरुष में एक-दूसरे के प्रति प्यार अपने चरम की ओर बढ़ने लगता है। दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं। गला व मुंह सूखने की समस्या भी आ सकती है।

डोपमाइन

प्यार करने वाले कुछ जोड़ों के मस्तिष्क के अध्ययन के बाद पता चला कि उनके मस्तिष्क में डोपमाइन न्यूरोट्रांसमीटर के स्तर में सामान्य से अधिक वृद्धि हो जाती है। यह रसायन काम इच्छाओं की पूर्ति के लिए बेचैनी पैदा करता है। यह रसायन मस्तिष्क पर कोकीन जैसा असर डालता है। ऐसे व्यक्ति की नींद व भूख गायब हो जाती है, किसी चीज़ में मन नहीं लगता है और अपने प्यार संबंधों के बारे में सोच-सोचकर वह ख़ुश होता है।

सेरोटोनिन

प्यार को वैचारिक जगत में ले जाने में सेरोटोनिन की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह एक ऐसा रसायन है जो प्यार को विचारों में प्रवेश कराता है।

हार्मोन और प्रेम सम्बंध

प्रेम की गहराई

प्यार अपने तीसरे पड़ाव पर आकर अत्यंत गहराई को उपलब्ध होता है। यहीं से व्यक्ति अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ लंबे सफ़र पर जाने को तैयार होता है। इस स्थिति में पहुंचे लोग ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव पर भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ने की सोचते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस भावना के लिए दो हार्मोंस – ऑक्सीटोसिन और वेसोप्रेसिन उत्तरदायी होते हैं।

ऑक्सीटोसिन

प्यार व लगाव को गहरा करने में ऑक्सीटोसिन की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस हार्मोंस के चलते स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के सबसे ज़्यादा क़रीब होना महसूस करते हैं। मां और बच्चे के बीच पैदा होने वाली गहरी भावनाएं भी इसी हार्मोंस के चलते पैदा होती हैं। न्यूयॉर्क में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ऑफ साइकोलॉजी डियान विट ने भेड़ और चूहों पर प्रयोग किया और पाया कि यदि उनके शरीर में ऑक्सीटोसिन के स्राव को रोक कर दिया जाए तो मादा भेड़ और चूहे अपने बच्चों को स्वीकार ही नहीं करते हैं।

वेसोप्रेसिन

लंबे समय तक वादा निभाने के लिए प्रेरित करने वाला हार्मोंस है- वेसोप्रेसिन । एक प्रकार के जीव पैरीवोल किए गए प्रयोग से यह बात सामने आई। पैरीवोल भी मनुष्यों की भांति रिश्ते बनाते हैं। जब नर पैरीवोल को वेसोप्रेसिन के प्रभाव को कम करने वाले ड्रग्स दिए गए तो उनके अपनी मादा साथी के साथ संबंध ख़त्म होने लगे, क्योंकि हार्मोन्स की अनुपस्थिति में भीतर लगाव की भावना ख़त्म होने लगी।

हम जानते या समझते हैं कि प्यार का संबंध दिल से हैं लेकिन चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इसका संबंध मस्तिष्क से है। चिकित्सा विज्ञान मानता है कि इसमें दिल की सिर्फ़ इतनी ही भूमिका है कि उसकी धड़कन तेज़ हो जाती है।