आयुर्वेद भारतीय जीवनचर्या का एक हिस्‍सा है। गंभीर से गंभीर बीमारियों में जब अन्‍य पैथियां थक जाती हैं तो आयुर्वेद सहारा देता है। प्राचीन काल में इसने गंभीर बीमारियों का सफल इलाज किया है। इसमें परहेज़ व अनुपान का विशेष महत्‍व है, अनुपान मतलब जिस चीज़ से साथ औषधि ली जाती है। आज भागदौड़ की ज़िंदगी में परहेज़ व अनुपान की कठिनता के चलते लोग एलोपैथ की तरफ तेज़ी से भाग रहे हैं, एलोपैथिक दवाओं से उनकी एक बीमारी तो ठीक हो जाती है लेकिन वहीं से अनेक बीमारियों की शुरुआत हो जाती है। परंतु आयुर्वेदिक दवाएं आज भी केवल स्‍वस्‍थ करती हैं, किसी तरह का नुक़सान नहीं पहुंचाती हैं, क्‍योंकि ये बनी ही उन्‍हीं पंचतत्‍वों से हैं जिनसे हमारा शरीर बना है।

इसी आयुर्वेद ने एक निरापद योग दिया लवण भास्कर चूर्ण का। यह स्‍वादिष्‍ट होने के साथ ही पेट की चौकीदारी भी करता है। यह भोजन पचाने की सर्वोत्‍तम औषधि है। 1 से 3 ग्राम तक इसे लेने पर यह पेट संबंधी सभी रोगों को दूर रखता है। इसका सर्वोत्‍त्‍म अनुपान मट्ठा है लेकिन इसे गुनगुने पानी के साथ भी लिया जा सकता है।

घर पर कैसे बनाएं लवण भास्कर चूर्ण

सेंधानमक, विडनमक, पीपल, पिपलामूल, तेजपात, काला जीरा, तालीस पत्र, नागकेशर, अम्लवेत (सब 24-24 ग्राम), जीरा, काली मिर्च, सोंठ (सब 12-12 ग्राम), बड़ी इलाची व दालचीनी 6-6 ग्राम, सौचल नमक 60 ग्राम, समुद्री नमक 96 ग्राम, अनार दाना 48 ग्राम लेकर मिला लें और इसे इतना बारीक पीस लें कि कपड़े से छाना जा सके। इसके बाद नींबू के रस में चूर्ण को मिला दें और छाया में सुखा लें। लवण भास्कर चूर्ण अब तैयार है।

लवण भास्कर चूर्ण के लाभ

– रात को खाना खाने के बाद इसे गर्म पानी से लेने पर कब्‍ज में राहत मिलती है और सुबह दस्‍त साफ़ होता है। यदि इस चूर्ण बराबर मात्रा में पंचसकार चूर्ण को मिलाकर लिया जाय तो सुबह पेट पूरी तरह साफ हो जाता है।

– इसके प्रयोग से डकार आना, भूख न लगने की समस्‍या दूर हो जाती है।

– गठिया, त्वचा के रोगों व आम वात की समस्‍या दूर कर देता है।

– यह जठराग्नि को तीव्र करता है और पित्‍त भी नहीं बढ़ने देता।

सावधानी

गुर्दे की बीमारियों, ब्‍लड प्रेशर के मरीजों व गर्भवती महिलाओं को इसका सेवन नहीं करना चाहिए।