हमारी भावनाओं की पूरी अभिव्‍यक्ति में शब्‍द समर्थ नहीं हो पाते। शब्‍दों के ज़रिये हम अपनी भावनाओं के बारे में सूचना तो दूसरे तक पहुंचा सकते हैं लेकिन पूरी प्रतीति नहीं। इनकी अभिव्‍यक्ति के लिए एक ऐसी भाषा है जो नि:शब्‍द है। वह भाषा मौन होने के बाद भी भावों के संप्रेषण में उसकी त्‍वरा व तीव्रता का कोई जवाब नहीं है। इसी भाषा का एक आयाम है चुंबन। चुंबन, प्‍यार की प्रतीति को दूसरे तक पहुंचाने में पूरी तरह समर्थ है। चुम्बन की प्रक्रिया में जहाँ हम बच्‍चे के चेहरे पर मुस्‍कान ला देते हैं, दादी की आंखों से ज्‍योति झरने लगती है वहीं प्रेमिका या पत्‍नी के दिल में शांति व आनंद की लहर दौड़ जाती है। प्रेमी-प्रेमिका जब चुंबन की प्रक्रिया में शामिल होते हैं तो शरीर का अस्तित्‍व नगण्‍य हो जाता है, वहाँ दो नहीं होते। वहाँ केवल चुंबन होता है और ऐसी स्थिति में जब केवल चुम्बन ही बचे, शरीर का भान न रहे तो ही चुंबन की सार्थकता है।

चुंबन और प्रेम की प्रतीति

चुंबन क्या है

Spirituality Behind Kiss

चुंबन केवल शारीरिक घटना मात्र नहीं है। प्रेमी-प्रेमिका के बीच यह चुंबन दो आत्‍माओं के मिलन का कारण बनता है। चुम्बन की प्रक्रिया में दो आत्‍माएँ एक हो जाती हैं, द्वैत मिट जाता है और अद्वैत घटता है। अद्वैत के घटते ही संसार विदा हो जाता है, मैं मिट जाता है और जो उपस्थित होता है, वह आनंद है, शांति है और वह अद्भुत है। आचार्य रजनीश ने कहा है कि यह घटना संभोग में घटती है। संभोग के क्षणों में दो मिट जाते हैं। वहाँ एक भी नहीं रहता, बस दो मिट जाते हैं। वहां कोई नहीं बचता। जब हम मिट जाते हैं तो आनंद की शुरुआत होती है। संभोग के क्षणों में मिलने वाला आनंद संभोग का नहीं है, बल्कि दो के मिट जाने का है। यह समाधि की झलक है। यही घटना गहरे व लंबे चुम्बन में भी घटती है। यह प्रेम की चरम अभिव्‍यक्ति है। आश्‍चर्य यह कि हर वस्तु अपने चरम पर पहुंचकर पतन की ओर अग्रसर होती है लेकिन प्रेम चरम पर पहुंचकर भी चरम पर नहीं पहुंचता और आगे ही बढ़ता जाता है। चुम्बन उसे और विस्‍तार और गहराई प्रदान करता है। जैसे ध्‍यान के लिए साधक एकांत व निर्जन स्‍थान की तलाश करते हैं, वैसे ही प्रेमी चुंबन के लिए शां‍त, निर्जन व एकांत स्‍थान की खोज करते हैं, ताकि चुम्बन की प्रक्रिया में कोई अवरोध उत्‍पन्‍न न हो। चुंबन भी एक साधना ही है बल्कि शरीर से ऊपर उठने का सबसे सरल साधन। जैसे साधना शुरू तो शरीर से होती है लेकिन इस प्रक्रिया में साधक शरीर से ऊपर उठ जाता है, वैसे ही चुंबन शुरू तो शरीर से ही होता है लेकिन चुबंन की प्रक्रिया प्रेमी-प्रेमिका को शरीर से बाहर कर देती है। यह ऐसी साधना है जो द्वैत से शुरू होकर अद्वैत की ओर ले जाती है और अद्वैत घटते ही घटता है परम आनंद। यदि परम आनंद न घटता तो इस संसार से चुम्बन कब का विदा हो चुका होता। चुबंन का अस्तित्‍व आदिकाल से आज तक सहस्रों वर्षों से यदि हमारे बीच मौजूद है तो यह इसी ओर संकेत करता है कि उसका परिणाम आनंद है। उसमें लोगों को दु:ख से ऊपर उठाने की सामर्थ्‍य है।

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