सात दिन के अंदर यदि बवासीर छू मंतर हो जाए तो क्या कहने। हाँ, यह सौ प्रतिशत सच है। हमारे गाँव में कोई ऐसा बवासीर का मरीज़ नहीं रहा जिसे दादी ने अपने नुस्खे से ठीक न कर दिया हो। दादी का यह नुस्खा, है तो आयुर्वेद का ही अंग लेकिन है बिल्कुल घरेलू। आइए जानें, बवासीर का आयुर्वेदिक उपचार क्या है?

बवासीर का आयुर्वेदिक उपचार

 

बवासीर का आयुर्वेदिक उपचार

कैसे बनाएं औषधि

अरीठा यानी रीठा लें। उसके बीज बाहर करें और शेष हिस्से को लोहे की कढ़ाही में डालकर उसे भूनकर पूरी तरह जला दें। जब वह कोयला बन जाए उसे आग से उतार लें। उसी के बराबर उसमें पपडिया कत्था मिलाकर बहुत बारीक पीस लें। बवासीर का आयुर्वेदिक उपचार की औषधि तैयार हो गई।

अरीठा के अन्य नाम

अरीठा गुजराती नाम है। मराठी व हिंदी में इसे रीठा कहते हैं। प्राचीन ग्रंथों में इसका अरिष्ट, रक्तबीज आदि नाम है। मारवाड़ी इसे अरीठो व पंजाबी रेठा कहते हैं। कर्नाटक में कुकुटेकायि के नाम से यह जाना जाता है।

अरीठा

सेवन विधि

बनी हुई औषधि में से प्रतिदिन सुबह-शाम 125 मिलीग्राम यानी लगभग एक रत्ती मक्खन या मलाई के साथ सात दिन लगातार सेवन करना ज़रूरी है। इसे लेने से कब्ज़ व खुजली से भी मुक्ति मिल जाती है। दादी कहती थीं कि यदि हर छह महीने पर सात दिन लगातार यह दवा खा ली जाए तो ज़िंदगी में कभी बवासीर नहीं होगा।

परहेज़

  1. इसका सेवन करने के दौरान सात दिन तक नमक बिल्कुल नहीं खाना चाहिए।
  2. उरद, घी, सेम, गरिष्ठ तथा भुने पदार्थों का सेवन कतई न करें।
  3. धूप, आग तापना, पाद को रोकना, साइकिल चलाना, संभोग व कड़े आसन पर बैठने से बचना चाहिए।

सहयोगी आहार

मूंग, चना, कुल्थी की दाल, पुराना चावल, सांठी चावल, बथुआ, परवल, तरोई, करेला, कच्चा पपीता, गुड़, दूध, मक्खन, काला नमक, सरसो का तेल, पका बेल, सोंठ आदि इस औषधि के सहयोगी आहार हैं।