अवसाद यानी डिप्रेशन जीवन का दुश्‍मन है। यह जीवन की सारी रंगत छीन लेता है, उत्‍साह मर जाता है और लोग समाज तथा लोगों से कटने लगते हैं। अपने को बहुत निकम्‍मा महसूस करने लगते हैं। उन्‍हें लगता है कि समाज में उनकी कोई इज़्ज़त नहीं है, कोई पूछ नही है, वह अपने को अकेला महसूस करने लगते हैं, यदि अवसाद बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है तो व्‍यक्ति आत्‍महत्‍या तक करने की सोचने लगता है।

अवसाद यानि डिप्रेशन

आमतौर पर जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं। लेकिन किसी घटना के चलते व्‍यक्ति यदि बहुत ज्‍यादा भयभीत हो जाए और वह भय उसका आजीवन पीछा करता रहे तो भी वह डिप्रेशन यानी अवसाद में चला जाता है। चेहरा हमेशा बुझा-बुझा रहता है। जीवन में ख़ालीपन भरने लगता है और जीवन निराश व उदास हो जाता है। कुछ भी अच्‍छा नहीं लगता है। दोस्‍त भी दुश्‍मन महसूस होने लगते हैं, उसे लगने लगता है कि सभी लोग उसके खिलाफ़ हैं, उसकी बुराई करते हैं तथा उसे बुरा समझते हैं। छोटी-छोटी बातों में वह निराशा का कारण तलाशने लगता है और अंतत: उसका जीवन पूरी तरह नकारात्‍मक हो जाता है। कहीं से भी उसे आशा की किरण दिखाई नहीं देती। ऐसे में वह आत्‍मघात कर सकता है।

ऐसे लक्षण यदि आपको अपने में दिखने लगें तो निराश व हताश होने या घबराने की ज़रूरत नहीं है बल्कि योग्‍य चिकित्‍सक से परामर्श लेना चाहिए। समय पर इसकी चिकित्‍सा करने से व्‍यक्ति अवसाद से बाहर आ जाता है और पुन: पहले जैसी ज़िंदगी जीने लगता है।

अवसाद सामान्‍य उदासी जैसा नहीं होता है। छोटे-छोट उतार-चढ़ाव सभी को प्रभावित करते हैं लेकिन कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो गहरे तक समा जाती हैं जिससे व्‍यक्ति अवसाद में चला जाता है। यह केवल असफल लोगों के साथ ही नहीं होता बल्कि बहुत से सफल लोग भी अवसाद की चपेट में आ जाते हैं। यह ऐसी बीमारी है जो दबे पांव आती है और पता नहीं चलता है। पता तब चलता है जब हम इसकी गिरफ़्त में पूरी तरह आ जाते हैं। इसलिए जब भी लोगों के बीच उठने-बैठने से उचाट महसूस हो तो तत्‍काल सतर्क हो जाना चाहिए। हालांकि ऐसी स्थिति में हम कारण भी तलाश लेते हैं कि हमें लोगों के बीच क्‍यों नहीं उठना-बैठना चाहिए। बहुत मामलों में हम सही भी होते हैं लेकिन बहुत मामलों में हम अवसाद के शिकार होते हैं।

क्‍या है अवसाद

अवसाद या डिप्रेशन एक मानसिक विकार है जो मनुष्‍य को नकारात्‍मक सोचने के लिए विवश करता है। इससे वह नितांत निराश, उदास व अकेला होता चला जाता है। उसे लोगों व्‍यवहार सम्‍मानजनक प्रतीत नहीं होता। अपने को प्रताड़ित महसूस करता है। हमेशा कुछ न कुछ नकारात्‍मक सोचता रहता है। इससे उसकी नींद चली जाती है या बहुत अधिक नींद आने लगती है। शरीर में हमेशा सुस्‍ती बनी रहती है। भूख नहीं लगती है। इसका असर पाचन शक्ति पर भी पड़ता है, भोजन ठीक से पचता नहीं है। किसी काम में उसकी एकाग्रता नहीं हो पाती, जो काम पहले वह बहुत आसानी से कर लेता था उसे करने में कठिनाई महसूस होने लगती है। गुस्‍सा बहुत ज़्यादा आता है, छोटी-छोटी बातों में व्‍यक्ति खीझ जाता है।

क्‍या करें

ये लक्षण यदि दिखें तो सबसे पहले किसी योग्‍य चिकित्‍सक से परामर्श लें। अपनी सोच को सकारात्‍मक रखें और बुरा सोचने से बचें। यह मानकर चलें कि सभी लोग आपकी बहुत इज़्ज़त करते हैं। यदि किसी कारणवश कोई आपसे तत्‍काल नहीं मिल पाता है तो सोचें कि कोई बड़ा कारण होगा नहीं तो यह व्‍यक्ति तुरंत मिल लेता। न मिलने के पीछे कोई नकारात्‍मक भाव न रखें। सबके प्रति सहानुभूति रखें। चीजों को समझने की कोशिश करें, छोटी-छोटी बातों में निराश न हों। यदि कोई बड़ी परेशान आती है तो यह सोचें कि यह भी बीत जाएगा। इससे आप तनाव मुक्‍त रहेंगे और स्‍वस्‍थ व प्रसन्‍न रहेंगे। साथ में दवा खाते रहें, ये चीज़ें आपको इलाज में मदद करेंगी।